84 कोसी परिक्रमा

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नैमिष परिचय


प्रथमं नैमिषं पुण्यं, चक्रतीर्थं च पुष्करम्।
अन्येषां चैव तीर्थानां संख्या नास्ति महीतले।।
तीरथ वर नैमिष विख्याता
अति पुनीत साधक सिधि दाता।।

नैमिष अथवा नैमिषारण्य तीर्थ भारत वर्ष के प्रमुख तीर्थों में से एक तीर्थ है। यह भारत वर्ष के उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के समीप जनपद सीतापुर में प्रसिद्ध गोमती नदी के तट पर स्थित है यह अठ्ठासी हजार ऋषियों की तपस्थली होने के कारण तपोभूमि के नाम से विख्यात है। आदिकाल में देवताओं की यज्ञ स्थली होने से इसे यज्ञ भूमि के नाम से भी जाना जाता है। पुराणों में इसे धर्मारण्यं कह कर भी सम्बोधित किया गया है।

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माँ ललिता देवी

का प्राचीन मन्दिर

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चौरासी कोसीय परिक्रमा


गंगायां योजने यज्ञे काश्यां चैवार्ध योजने।­
कुरूक्षेत्रे क्रोशमेकं नैमिषे तु पदे-पदे।।

एक बार देवतागण दैत्यों को विजित कर दधीचि मुनि के आश्रम आये उन्होंने सपत्निक उनका अतिथि सत्कार किया। देवताओं ने लोकहित में अपने दिव्यास्त्रों की सुरक्षा का भार महर्षि को प्रदान किया। समय बीतता गया पर देवताओं ने अपने दिव्यास्त्रों की सुध न ली इससे चिन्तित होकर महर्षि जी ने शास्त्रास्त्र के सार तत्व को संग्रह कर घोल बनाकर पान कर लिया और निश्चिन्त होकर तप करने लगे। अति दीर्घकाल बीत जाने के बाद शत्रुओं से भयभीत होकर देवगण स्व शस्त्र लेने आये तब महर्षि ने बताया कि सुरक्षा की दृष्टि से उन्होंने शास्त्रास्त्रों के सार तत्व का मन्त्रशक्ति से पान कर लिया है अब यह शक्तियाँ मेरी अस्थियों में समाहित है। देवताओं ने महर्षि से विनम्र प्रार्थना कि यदि शास्त्रास्त्र उन्हें वापस न मिले तो वे सभी शत्रुओं से पराभूत हो त्राण न पा सकेगे।

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