84 कोसी परिक्रमा

Profile Photo

गंगायां योजने यज्ञे काश्यां चैवार्ध योजने।

­

कुरुक्षेत्र क्रोशमेकं नैमिषे तु पदे-पदे।।

एक बार देवतागण दैत्यों को विजित कर दधीचि मुनि के आश्रम आये उन्होंने सपत्निक उनका अतिथि सत्कार किया। देवताओं ने लोकहित में अपने दिव्यास्त्रों की सुरक्षा का भार महर्षि को प्रदान किया। समय बीतता गया पर देवताओं ने अपने दिव्यास्त्रों की सुध न ली इससे चिन्तित होकर महर्षि जी ने शास्त्रास्त्र के सार तत्व को संग्रह कर घोल बनाकर पान कर लिया और निश्चिन्त होकर तप करने लगे। अति दीर्घकाल बीत जाने के बाद शत्रुओं से भयभीत होकर देवगण स्व शस्त्र लेने आये तब महर्षि ने बताया कि सुरक्षा की दृष्टि से उन्होंने शास्त्रास्त्रों के सार तत्व का मन्त्रशक्ति से पान कर लिया है अब यह शक्तियाँ मेरी अस्थियों में समाहित है। देवताओं ने महर्षि से विनम्र प्रार्थना कि यदि शास्त्रास्त्र उन्हें वापस न मिले तो वे सभी शत्रुओं से पराभूत हो त्राण न पा सकेगे।

महर्षि जी को दया आ गयी और वह बोले मैं योग मुक्त हो प्राण त्यागता हूँ और तुम लोग मेरी अस्थियांे से उत्तम अस्त्र प्राप्त कर लो। किन्तु शरीर त्याग से पहले उन्होंने सभी तीर्थो के स्नान से शरीर पवित्र करने की प्रबल कामना प्रकट की। देवताओं ने समयाभाव का विचार करते हुये लोक कल्याणार्थ भूमण्डल के समस्त तीर्थों का नैमिष में आवाहन किया तथा उन तीर्थों के मिश्रित जल से मुनि के शरीर को स्नान कराकर गऊँवों से उनकी त्वचा चटवाकर अस्थि ग्रहण कर बज्र बनवाया तत्पश्चात् अपने प्रबल शत्रु वृत्तासुर का संहार किया। वास्तव में वृत्तासुर वृत्त के समान भंवर पैदा कर किसी निश्चित स्थान से भूमण्डल की प्राण वायु (आक्सीजन) को समाप्त कर देता था। जिससे उसके विरूद्ध खड़ी सेना प्राण वायु के अभाव में मनोबलहीन हो जाती थी और आसुरी शक्तियाँ विजयी हो जाती थी, यही कारण है कि देवताओं की शक्ति असुरों के समक्ष कमजोर हो जाती है।

वह स्थान जहाँ महर्षि दधीचि जी के शरीर को तीर्थों के मिश्रित जल से स्नान कराया गया वह जल कुण्ड मिश्रित तीर्थ कहलाया। इसी कुण्ड के पास महर्षि दधीचि की प्रसिद्ध समाधि भी है जहाँ उन्होंने योग क्रिया से प्राणों का विसर्जन किया था।

एक बार माता पार्वती ने जन कल्याणार्थ तीनों लोक के स्वामी भगवान शिवशंकर से कलयुग में घटित होने वाली तीर्थयात्रा के सम्बन्ध में प्रश्न पूछते हुए कहा कि कलयुग में प्राणी एक लोक की यात्रा के लिए भी समय न दे सकेगा, तो ऐसे में वह किस प्रकार तीनों लोकों की यात्रा करेगा? तीनों लोक के स्वामी भगवान शंकर ने सहज भाव से उत्तर देते हुए कहा, जो प्राणी कलयुग में नैमिष की चैरासी कोसीय यात्रा करेगा उसे तीनों लोक की तीर्थ यात्रा का अक्षय फल मिलेगा। ऐसा इसलिए संभव है क्योंकि महर्षि दधीचि की शरीर त्याग से पूर्व की इच्छा को पूर्ण करने के लिए तीनों लोकों के समस्त तीर्थ नैमिष की तपोभूमि में उनके समक्ष विराजमान हुए अतः चैरासी कोसीय परिक्रमा से प्राणी को तीनों लोकों के समस्त तीर्थों का मनवांछित लाभ मिलता है।

आज भी यह मान्यता प्रचलित है जो प्राणी भूमण्डल के सभी तीर्थो की यात्रा करने में सक्षम नहीं है वह नैमिषारण्य की 84 कोसीय परिक्रमा कर, ब्राह्मणों को दान धर्म करेगा उसे समस्त तीर्थों का फल प्राप्त होगा। प्रत्यक्ष रूप से समस्त तीर्थ व 33 करोड़ देवी देवता इसी भूमि में वास करते है।

वामन पुराण के अनुसार-

पृथिव्यां यानि तीर्थानि तानि सर्वाणि नैमिषे।

84 कोस परिक्रमा कब प्रारम्भ करें

यह परिक्रमा फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को चक्रतीर्थ में स्नान कर, फाल्गुन मास के शुक्लपक्ष की प्रतिपदा को सिद्ध विनायक जी के पूजा अर्चना कर आरम्भ होती है। यह यात्रा पन्द्रह दिनों तक चलती है। इसके करने से सम्पूर्ण तीर्थों का फल प्राप्त होता है और मनुष्य 84लाख योनियों के भयबन्धन से मोक्ष प्राप्त करता है।

श्री सिद्धि विनायक

मनुष्य की इस संसार रूपी यात्रा में विघ्नों का आना और उन विघ्नों पर विजय प्राप्त कर अपने उद्देश्य को पाना मनुष्य की सच्ची सफलता है। सभी सांसारिक एवं आध्यात्मिक कार्यो में विघ्नों को दूर रखने के लिए आदि देव भगवान शिव ने अपने पुत्र गजानन को विघ्नों का स्वामी बनाकर धर्मारण्य में महात्माओं की रक्षा का भार सौंपा। इसीलिए किसी भी आध्यात्मिक सांसांरिक कार्य को करने से पहले सिद्धि विनायक जी की पूजा का अत्यन्त महत्व है। अतः चैरासी कोस की यात्रा प्रारम्भ करने से पहले श्रीसिद्धि विनायक जी को प्रणाम कर उनका आर्शीवाद लेना महत्वपूर्ण है।

सूत गद्दी

व्यास जी से पुराणों की शिक्षा प्राप्त कर सूत जी ने इसी स्थान पर बैठकर शौनकादि 88 हजार ऋषियों को लोक शिक्षार्थ पुराण कथाओं की विस्तृत व्याख्या की।

व्यास गद्दी

व्यास गद्दी नैमिषारण्य का एक प्रसिद्ध पौराणिक दर्शनीय स्थल है इसी स्थान पर पाराशर मुनि की उत्पत्ति शक्ति पत्नी अदृश्यन्ती से हुई थी जो श्री व्यास जी के पिता थे। आज कलियुग में मनुष्य अल्पआयु, अल्पमेधावान होने के कारण सम्पूर्ण वेद को धारण करने में असमर्थ है। इन बातों का ज्ञान श्री वेद व्यास जी को पहले ही हो चुका था। अतः उन्होंने वेदों को चार भागों में विभाजित कर पुनः इसे 6 शास्त्र, 18 पुराणों में विभाजित किया जिससे की वेदों के अर्थों को सुगमता से समझा जा सके।

स्वयंभुव मनुसतरूपा

हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार मानव सृष्टि का आरम्भ स्वयंभुव मनु और उनकी पत्नी सतरूपा से हुआ है। व्यास गद्दी के समीप ही पूर्व दिशा में मनु सतरूपा की तपस्या स्थली है। इसी स्थान पर जन कल्याण के लिए सतयुग में स्वयंभुव मनु और रानी सतरूपा ने 23 हजार वर्षों तक कठिन तप किया जिससे प्रसन्न होकर निर्गुण निराकार ब्रह्म ने सगुण हो त्रेता युग में राम के रूप में अपने अंशो सहित आने का आर्शीवाद प्रदान किया। यह भूमि अवतारों की कारण भूमि कहलाती है।

आदि गंगा गोमती

गोमती नदी को गोमती अथवा आदि गंगा गोमती के नामों से जाना जाता है। यह नैमिषारण्य की भौगोलिक स्थिति की परिचायक है। पुराणों में एकादशी के दिन गोमती नदी में स्नान करने का विशेष महत्व बताया गया। स्कन्दपुराण के अनुसार यदि कलियुग में गोमती में एक दिन भी स्नान कर लिया जाये तो सभी तीर्थों में स्नान का फल प्राप्त होता है।

रामधाम

यहाँ पर त्रेता युग में मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान राम के विद्या काल से लेकर राज्य शासन के बाद तक पाँच बार आने का उल्लेख पुराणों में प्राप्त होता है। इसी कारण इस स्थान को रामधाम के नाम से जाना जाता है।

अश्वमेघ यज्ञशाला एवं लक्ष्मीनारायण मन्दिर

पौराणिक गाथाओं के अनुसार नैमिषारण्य में गोमती के तट पर सहस्त्रों अश्वमेघ, बाजपेय, अग्निष्टोम, विश्वजित, गोमेघादि यज्ञों को सांगोपांग विधियों से पूर्ण किया। यज्ञों की यह परम्परा आज भी नैमिषारण्य में देखी जा सकती है।

पद्म पुराण के अनुसार.

तस्तु गौमती तीरे नैमिषे जन संसदि।
इयाज वाजिमेधेन राघवः परवीरहा।।
.......चकार विविधान् यज्ञान परिपूर्णान्सदक्षिणान।।

महर्षि बाल्मीकि श्रीमद्रामायण के उत्तरकाण्ड में श्रीराम के द्वारा सम्पादित किये हुए अश्वमेघ यज्ञों का वर्णन किया है।

यज्ञवाटश्च सुमहान गोमत्या नैमिषेवने।
.......अनुभूय महायज्ञं नैमिषे रघुनन्दन।।

यज्ञों के एक प्राचीन सिद्धान्त के अनुसार सभी यज्ञों को भगवान विष्णु का स्वरूप माना गया है। यज्ञों में दी जाने वाली दक्षिणा ही लक्ष्मी है। अतः उपरोक्त वर्णित यज्ञ स्थल पर श्री लक्ष्मी नारायण की आराधना आचार्य परम्परा के अनुसार आज भी चली आ रही है। यह रामानुज सम्प्रदाय का प्राचीनतम स्थान है। भगवत्पाद श्री रामानुजाचार्य स्वामी का आगमन भी इसी स्थानपर हुआ था। ऐसे पावन स्थल पर आना और उसका दर्शन करना ही मनुष्य मात्र को अनेकों यज्ञों का फल प्रदान करता है।

हनुमान गढ़ी

यह एक प्रसिद्ध दर्शनीय स्थल है। यहाँ पर लंका की ओर मुख किये हुए हनुमान जी की एक विशाल प्रतिमा है।

पाण्डव किला

लोमश ऋषि की प्रेरणा पाकर वनवास काल से धर्मराज युधिष्ठर अपने भाइयों व द्रोपदी सहित तीर्थ के उद्देश्य से इस स्थान पर निवास किया।

रूद्रावर्त तीर्थ

नैमिषारण्य में गोमती नदी के तट पर एक प्राचीन शिव मन्दिर के ध्वन्षावशेष आज भी देखे जा सकते है। इसकी सिद्धता देखते ही बनती है। मन्दिर के समीप तट पर बेल पत्रों एवं फलों का ऊँ नमः शिवाय के पन्चाक्षरी मंत्र के उच्चारण के साथ जल में अर्पित करने से वह बिना प्लवन किये जल में समाहित हो जाती है तथा उन्हीं फलों में से कुछ फल प्रसाद रूप में बाहर आ जाते है।

हत्याहरण

वृत्तासुर वध के कारण देवराज इन्द्र ब्रह्म हत्या के दोष से अत्यन्त दुःखी थे तत्पश्चात् वह नैमिषारण्य आये और इस स्थान पर एक पैर के अंगूठे के सहारे खड़े होकर दोनों बाँंहे ऊपर उठाकर सूर्याभिमुख कठिन तप किया। उनके तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने वर मांगने को कहा। इन्द्रदेव बोले हे प्रभु मैं ब्रह्म हत्या के पाप से ग्रसित हूँ, कृपया आप इसकी शान्ति का उपाय बताइये। तब भगवान शिव ने एक सरोवर की ओर इंगित करते हुए कहा इसमें स्नान करने पर तुम ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हो जाओगे। प्रभु की आज्ञा पाकर इन्द्र ने उस सरोवर में स्नान किया और ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्त हो गये। इसी स्थान पर इन्द्र ने भगवान इन्द्रेश्वर की स्थापना की। त्रेतायुग में लंकापति रावण का संहार करने के पश्चात् भगवान श्रीराम को भी ब्रह्मदोष लगा अपने गुरु वशिष्ठ के दिशा निर्देश के पश्चात् भगवान श्रीराम ने इस सरोवर में स्नान कर तथा अश्वमेघ यज्ञ कर ब्रह्मदोष से मुक्त हुये। आज भी अनेकों भक्त गौ आदि पशुहत्या दोष से मुक्ति पाने के लिए यहाँ स्नान करने आते है।

निष्कर्ष

सार रूप में नैमिषारण तीर्थ सभी तीर्थों का फल प्रदान करता है। नैमिष तीर्थ मनुष्य के समस्त पापों एवं व्याधियों का समूलनाश करता है तथा यहाँ पर किये गये पिण्ड श्राद्ध से पितरों को अक्षय तृप्ति होती है, यहाँ चैरासीकोस में की गई परिक्रमा मनुष्य को 84 लाख योनियों से मुक्ति प्रदान करती है। त्रेता युग मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम जी ने यहाँ पर अश्वमेघ यज्ञ किया। इस पावन.पुनीत यज्ञमय धरती पर प्रवेश करने मात्र से मनुष्य को एक आध्यात्मिक शान्ति की अनुभूति प्रदान होती है। इस आरण्य ;वनद्ध क्षेत्र में ब्रह्म मुहूर्त से ही मंत्रोच्चारण की ध्वनियां गंूजायमान होने लगती है। जिनका मन और मस्तिक पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

नैमिषारण्य में दान का महत्व

पुराणों में नैमिषारण्य क्षेत्र में दान के लिए विस्तृत चर्चा की गई है जिनमें मुख्य रूप से गोदान, भूमि दान, अन्नदान स्वर्णदान, रजतदान, वृक्षदान, भवन दान, शय्यादान आदि स्वयं एवं पितरों के निमित्त किये जाते है। इस प्रकार के दान से मनुष्य को यज्ञ का फल प्राप्त होता है और उसे ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। प्रस्तुत श्लोक से यह बात स्पष्ट होती है।

कूर्मपुराण के अनुसार-

अत्र दानं तपस्तप्तं श्राद्धयागादि क´्च यत।
एकैकं नाशयेत् पापं सप्त जन्मकृतं तथा।।
अत्र प्राणान् परित्यज्य नियमेन द्विजातयः ।
ब्रह्मलोकं गमिष्यन्ति यत्र गत्वा न जायते।।